आज ही के दिन 30 मई 1866 में मौलाना क़ासिम नानौतवी ने दारुल उलूम की बुनियाद रखी थी। यह मिस्र और मदीना यूनिवर्सिटी के बाद दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इस्लामिक यूनिवर्सिटी है। यहां दुनिया भर से छात्र इस्लामिक तालीम के लिए आते है।
1857 की क्रांति के बाद एक तरफ सर सैय्यद अहमद खां ने मुसलमानों को अंग्रेजी ज़ुबान और पश्चिमी तालीम से जोड़ने के लिये अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना की वही दूसरी तरफ मौलना क़ासिम नानोतवी ने जो अंग्रेजी ज़ुबान और अंग्रेजों के खिलाफ थे उन्होंने इस्लामिक तहज़ीब बचने के लिये दारूल उलूम की स्थापना की।
ये 1857 के क्रांति का दौरान मौलान रहमतुल्लाह, मौलान रशीद अहमद गंगोही के साथ कई उल्मा ए देवबन्द शामली के शामिल रहे। ये वो दौर था जब मौलाना महमूद हसन उन सैनानियों में से एक थे उन्होंने न केवल भारत में बल्कि विदेशों (अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, तुर्की, सऊदी अरब व मिश्र) में जाकर ब्रिटिश साम्राज्य की मुख़ालफत की।
सन 1914 ई. में इन्ही के शागिर्द मौलाना उबैदुल्ला सिंधी ने अफ़गानिस्तान जाकर अंग्रेज़ों के विरूद्ध अभियान चलाया और काबुल में रहते हुए भारत की स्र्वप्रथम स्वंतत्र सरकार स्थापित की जिसका राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप को बना गया।
शेखुल हिन्द 1915 ई. में हिजाज़ (सऊदी अरब का पहला नाम था) चले गये, उन्होने वहां रहते हुए अपने साथियों द्वारा तुर्की से संपर्क बना कर सैनिक सहायता की मांग की। मदीने में उस समय तुर्की का गवर्नर ग़ालिब पाशा ने उनको मदद का भरोसा दिया। लेकिन उसके फौरन बाद
सन 1916 ई. में अंग्रेज़ों ने किसी जासूस की मदद से शेखुल हिन्द को मदीने में गिरफ्तार कर लिया। हिजाज़ से उन्हें मिश्र लाया गया और फिर रोम सागर के एक टापू मालटा में उनके साथयों मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना उज़ैर गुल हकीम नुसरत, मौलाना वहीद अहमद सहित जेल में डाल दिया था।
शेखुल हिन्द की अंग्रेजों के विरूद्ध तहरीके-रेशमी रूमाल, अभियान चलाया जो आज भी लंदन के लायब्रेरी में सुरक्षित है
दारुल उलूम ने आज़ादी के जंग में जो कुर्बानियां दी है उन्हें भुलाया नई जा सकता।
अल्लाह इनकी क़ुर्बानियों को कुबूल फरमाए

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