Wednesday, May 22, 2019

APCR की बड़ी कामयाबी ।


*देर आये दुरुस्त आये*

_आकिद मिर्ज़ा की क़लम से_

_*उसूलों पे आँच आ जाये तो टकराना ज़रूरी है,*_
_*जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है*_

*1. पुसद अब्दुल मालिक केस के अहम तथ्य*

पुसद में ईद-उल-अज़हा के दौरान पुलिस कर्मचारियों पर अब्दुल मलिक अब्दुल रज्जाक ने जानलेवा हमला किया था ၊ जांच के दौरान उसे देश विरोधी गतिविधियों के लिए शोयब अहमद खान और हाफिज मुजीबुर रहमान के उकसाने की बात सामने आने पर एटीएस ने तीनो अभियुक्तों को हिरासत लेकर दोषारोप पत्र नागपुर जिल्हा न्यायालय में पेश किया था ၊ बाद में एक विशेष नोटिफिकेशन के तहत केस को नागपुर से अकोला ट्रांसफर किया गया। जहां एटीएस के विशेष न्यायाधीश ए एस जाधव ने 2 साल के लंबे अरसे चले मुकदमे के बाद मुख्य अभियुक्त अब्दुल मालिक को धारा ३५३ , ३३२ , ३२४ के तहत दोषी पाया जबकि न्यायालय ने शोएब और हाफिज मुजीब को एटीएस के आरोप से मुक्त कर, सभी गुनाहों से बाइज़्ज़त बरी किया । चूंके अब्दुल मालिक अपने हिस्से की 3 साल की सज़ा जेल में बिता चुका था, इस लिए उसे फाइन ले कर रिहा करदिया गया।

*2. जमीयत, जमाअत और घर के लोग*

 जमीयत उलेमा ए हिन्द, हलका महाराष्ट्र, मुल्क भर में बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को इंसाफ दिलाने का काम हमेशा से करती आई है। इस केस में भी जमीयत की तरफ़ से बहोत ही मारूफ़ व क़ाबिल वकील जनाब तहिवार पठान साहब व उनके मातहत जनाब इशरत खान साहब ने शुरुआती पैरवी की। तो वहीं जमाअत-ए-इस्लामी की जानिब से विदर्भ के मारूफ़ वकील नगमान अली साहब पैरवी कर रहे थे। मैं आकिद मिर्ज़ा हाफ़िज़ मुजीब और शोएब के वालिद और भाई (क्रमशः) के कहने के मुताबिक़ इन दोनों साहेबान को असिस्ट कर रहा था।
चूंके मैं भी पुसद शहर से ताल्लुक रखता हूं और मामला भी पुसद का था जिसमे शोएब और हाफ़िज़ मुजीब को मैं अच्छि तरह जानता था। और मुझे बखूबी पता था के ये इल्ज़ामात हर तऱीके से बेबुनियाद है। नागपुर ए. टी.एस. कोर्ट में जब भी पेशी होती, जमीयत, जमाअत और घर के वुकला के इलावा उनके इफ्राद भी कोर्ट में मौजूद रहते। जमीअत ओर जमाअत के लोगों को काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता मगर क़ौम के दर्द के सामने परेशानियों को पीछे छोड़ कुछ कर गुजरने का जज़्बा सब के दिलों में था।

*3. चार्जशीट, बेल और केस का ट्रांसफर*

ए.टी.एस. ने मामलें में चार्जशीट दायर की। मामला नागपुर के मुख्य ज़िला न्यायाधीश के सामने विचाराधिन था। जमीअत केस में अब्दुल मालिक की ज़मानत अर्ज़ी निचली अदालत में ही लगा चुकी थी जो की निचली अदालत द्वारा ही नकार दी गयी थी। रिविज़न अर्ज़ी मुख्य ज़िला न्यायाधीश के समक्ष लगाई गई। जिसमें ATS ने जवाब दाखिल करने का उतना ही समय लिया जितना के अक्सर हम फिल्मों में सुनते आए है और तारीख पर तारीख होती रही। इसी दरमियान मुख्य ज़िला न्यायाधीश, नागपुर का प्रोमोशन हो कर उन्हें हाई कोर्ट जज बना दिया गया व मुख्य ज़िला न्यायाधीश कोर्ट ख़ाली (vacant) होगया।  कुछ हफ़्तों बाद नई मुख्य ज़िला न्यायाधीश, नागपुर आयीं और मामला आगे बढ़ा। उन्होंने एक या दो सुनवाई के बाद मामला स्पेशल कोर्ट मकोका, नागपुर में ट्रांसफर कर दिया।
  ATS अपने विशेष सीनियर सरकारी वकील, पी.के.साथिएनाथन साहब को अप्पोइंट कर मामले में अपना जवाब दाखिल कर चुकी थी। मामला अब सुनवाई के लिए रखा गया। तभी अचानक स्पेशल कोर्ट मकोका, नागपुर के जज साहब का ट्रांसफर होगया। कोर्ट फिर से ख़ाली (vacant) होगया। पेशी पर अभियुक्तों को लाया जाता और मैं उनसे मिलकर उनको मामले की नोइय्यत समझाया करता और हिम्मत अफ़ज़ाई करता।
  2016 के रमज़ान शुरू हो चुके थे। अब्दुल मालिक की ज़मानत अर्ज़ी लगी हुई थी और मामले में चार्ज फ्रेम न हो इसलिए शोएब की डिस्चार्ज अर्ज़ी लगाई हुई थी। कुछ दिन बाद हाफ़िज़ साहब की बेल अर्ज़ी लगाई गई। मामले में नए जज आये जो के मुस्लिम थे। सुनवाई हुई। तहीवार पठान साहब मुम्बई से नागपुर आये। उनके अल्फ़ाज़ से उनका दर्द छलक रहा था। उनका एक एक लफ्ज़ उनके दिल से निकल कर नश्तर का काम कर रहा था। उनके तर्क और उनके दलीलों का हक़ीक़त में कोई सानी नही था। मैं उनको मामले में असिस्ट कर रहा था।  सरकारी वकील ने मामले में सुनवाई के लिए वक़्त मांगा। मामला आगे बढ़ता रहा। तारीख पर तारीख होती रही। पठान साहब ने मुझे मामला देखने को कहा। मैंने एक दिन, गुस्से और बेचैनी के आलम में जज साहब से कहा "क्या आपने इस मामले को सिविल मामला समझ कर रखा है, 3 मासूम ज़िन्दगियों और उनसे जुड़े हज़ारो इमोशन्स का सवाल है और आप तारीख बढ़ाते हुए जा रहे है।" जज साहब ने जवाब दिया "वकील सहाब, ऐसी तो कोई बात नही है, सरकारी वकील साहब एक और केस में पैरवी कर रहे है जिसे उन्हें 3 महीने में ख़त्म करना है। हाई कोर्ट का आर्डर है।" मैने कहा "सर, आप उन्हें लास्ट चांस दीजिये, या फिर आर्डर करिये" बोले ठीक है।

 सुनवाई हुई, सरकारी वकील के पास हमारी दलिलों का कोई जवाब नही था। मामला अब आर्डर के लिए रखा गया। मामला कोर्ट के समझ मे आ चुका था की पूरा मामला ही फ़र्ज़ी है।  एक साधारण से केस को जबरदस्ती एक UAPA मे तब्दील किया गया था।

*4. साज़िश या हक़ीक़ी ट्रांसफर*

अब्दुल मालिक और हाफिज साहब की ज़मानत अर्ज़ी नकार दी गयी थी। इसी बिच मैंने शोएब की बेल एप्पलीकेशन लगाई। इत्तेफ़ाक़ ऐसे हुआ के जिस दिन मैंने शोएब की ज़मानत अर्ज़ी लगाई ठीक उसी दिन कोर्ट में मामला ट्रांसफर करने के लिए स्पेशल नोटिफिकेशन आया। मामला कहां ट्रांसफर होगा ये अभी साफ़ नही था। गर्मी की छुट्टिया लग चुकी थी। मामला पेंडिंग रखने के लिए कहा गया था। विशेष आर्डर के सिवा मामले में कोई भी स्टेप लेने का न्यालय को अधिकार नही था।फिर से वही तारीख पर तारीख होती रही लेकिन इंसाफ नही मिला। कई हफ़्ते गुज़र जाने के बाद भी न तो मामला ट्रांसफर किया गया और न ही कुछ क़दम न्यायालय द्वारा लिए गए।  फ़िर एक दिन मैंने मुख्य ज़िला न्यायाधीश मैडम से शिकायत की के "ये मामलें में क्या होरहा है, कोर्ट पर कोर्ट बदल रहे है और तारीख़ पर तारीख़ हो रही है, इतना समय तो सिविल केस में नही लगाते जितना आप इस केस में लगा रहे हो।" मैडम ने मुझे सुपरिटेंडेंट से मिलने को कहा, सुपरिटेंडेंट से मिला, उससे गुज़ारिश और कुछ देन के बाद कागज़ात पर मुख्य ज़िला न्यायाधीश के दस्तखत के लिए उसे लाया। मुख्य ज़िला न्यायाधीश ने दस्तख़त किये और मामला अकोला जाना तय हुआ।
मेरे और हम सभी के मन में विचार थे के ये सच मे हक़ीक़ी ट्रांसफर है या किसी साज़िश के तहत हुकूमत मामले को डिले करना चाह रही है।

*5. पठान साहब का कॉल*

मामले की फ़ाइल सील होचुकी थी। मामला अगले हफ़्ते अकोला जाना था। मामले के ट्रांसफर के एक दिन पहले की सुबह मुझे पठान साहब का कॉल आया के भाई मुझे अबदुल मालिक की जमानत अर्जी की सर्टिफाइड कॉपी चाहिए। मैने कहा सर, कोशिश कर सकता हूं क्यों कि फ़ाइल तो सील होगयी है। बोले जो बन पड़े करो। कोशिश करो। अल्लाह तुम्हे कामयाब करे।

*6.सर्टिफाइड बना सर दर्द*

मैंने सर्टिफाइड के लिए अर्ज़ी की।  बाबू से पहचान थी इसिलिए बिना कोई परेशानी के लिए फॉर्म का हमदस्त मिल गया। मैं हमदस्त ले कर कोर्ट में गया। कोर्ट ने मुझे कागज़ात देने से मना कर दिया। मैं स्तब्ध था। कोर्ट का तर्क भी बराबर था। मैंने बहोत मिन्नत की। कोर्ट का कहना था के "मामला कल अकोला जाना है और आप आज सर्टिफाइड के लिए आये हो। सर्टिफाइड सेक्शन अगर रिकॉर्ड चला गया तो कल तक रिकॉर्ड नही आएगा तब मैं क्या करूँगा?" मैंने कहा 'सर मैं पर्सनली गारंटी लेता हूं के रिकॉर्ड आज 4 बजे तक कोर्ट में आजाये। उसके लिए मुझसे जो बन पड़ेगा करूँगा" काफ़ी मिन्नतों के बाद जज साहब माने।

सील खुलवाई गयी, बाबू लोगों को काम पर लगाया गया। आनन फ़ानन में रिकॉर्ड तैयार किया गया। 7वें मज़ले से रिकॉर्ड 1लें मज़ले पर लाया गया। copying section में सबको अपने हाथों का काम छुड़ा कर पहले हमारा रेकॉर्ड तैयार करवाया गया। और 4 बजे के पहले ही फ़ाइल कोर्ट पोहचा दी गयी। सर्टिफाइड महज़ दो घंटों में तैयार करवाया गया।  मैने पेपर्स को तुरंत मुम्बई कूरियर किये। जमीयत ने मुझे लगने वाला खर्च के ज़बरदस्ती पैसे अदा किए। कोर्ट का स्टॉफ मुझसे कह रहा था "मिर्ज़ा साहब, ये क्या सर दर्द ले कर आगये, अच्छा हुआ जो मामला अकोला चला गया वरना आप तो जीना दुश्वार कर देते"

*7. मामला अकोला ट्रांसफर हुआ*

मामला अकोला ट्रांसफर हुआ। और जमाअत के तरफ से वहां जनाब अली रज़ा खान साहब को वकील रखा गया। अब मामले में नया मोड़ आचुका था। मैं और मेरे साथी नागपुर से अकोला शोएब के लिए जाते थे, मुम्बई से पठान साहब अब्दुल मालिक के लिए आया करते और अली रज़ा साहब हाफिज मुजीब के लिये आते।

*8. बेल, जेल ट्रांसफर और हम वुकला*

नया गड़ी नया राज वाली कहावत को अपनाया गया। फिरसे शोएब और अबदुल मालिक की बेल डाली गई। फिर से पठान साहब ने अब्दुल मलिक के लिए सुनवाई की। फिर एक बार सरकारी वकील साहब और ATS के अफ़राद चुप्पी साधे हुए थे। शोएब के लिए मेरे सीनियर और साथी समीर सर और मैंने दलीलें पेश की। एक सुंदर, जोशीले और दिल की बात कोर्ट के सामने रखी। मामला आर्डर के लिए लगाया गया। अगली दो तारीखों के बाद बेल नकार दी गयी। आर्डर में कोई दम खम नही था।

वुकला और तंज़ीमो के नुमाईंदों के बीच कोर्ट में चाय पर चर्चा हुई। जिसमें ये तय हुआ के बगैर एक दूसरे को बताए कोई भी मामले में कोई भी कदम नही लेंगा। हाफ़िज़ साहब की तबियत बिगड़ गयी थी इसीलये उन्हें नागपुर में भर्ती किया गया था। तय हुआ के हाफ़िज़ साहब की मेडिकल के लिए बेल अर्जी डाली जाए। बेल डाली गई। जो फिरसे नकार दी गयी।

*9. हाफ़िज़ साहब की बेल और पुसद शहर के सियासतदान*

तय हुआ के हाई कोर्ट, नागपुर में हाफ़िज़ साहब के लिए बेल अर्ज़ी मैं और समीर सर लगायेंगे। affidavit के लिए मौलाना साहब के वालिद बाबू भाई को हाई कोर्ट बुलाया गया चूंके उन्होंने हमें इस काम के लिए अप्पोइंट किया था। बेल फ़ाइल की गई। मामलें में सुनवाई हुई और ATS को नोटिस जारी हुई।
अब हुआ यूं के अगले दिन पुसद शहर के कुछ नामचीन लोगों के मुझे फ़ोन आने लगे के आप हाफिज साहब की बेल अर्ज़ी वापस ले ले। मैंने कहा क्यों लू मैं वापस तो कहने लगे के नही अब से ये मामला हम देखेंगे। रोज़ तक़रीबन 3 से 4 कॉल आते जो कि घंटो तक चलते ओर मैं उन्हें समझाया करता के कुछ दिन शायद एक हफ्ते में हाफ़िज़ साहब इंशा अल्लाह बाहर होंगे। लेकिन वो नही मानते। अब बात यहां तक पहोच गयी के मेरे वालिद साहब का नाम ले कर कहा गया के जाहेद भाई से हम बात कर लेंगे बस तुम हट जाओ। मैने जवाब दिया मैने ये केस मेरी मर्ज़ी और बाबू भाई की इजाज़त से लिया हु। जब तक बाबू भाई नही कहेंगे मैं पीछे नही हटूंगा। नतीजा ये निकला के उनपर दबाव लाया गया जिस की वजह से उन्होंने मुझे मामला वापिस लेने को कहा। मैंने उन्हें नागपुर बुलाया और केस वापसी के पेपर्स पर उनकी दस्तखत ली।

*10. दिल को चोट पोहची*

दिल को ना क़ाबिल बर्दाश्त चोट पोहची थी। कुछ लोग बस क्रेडिट लेने की होड़ में काज हुए थे। जिसकी वजह से मामले में देरी हो रही थी। काफी समझाने पर भी नही माने तो बेदिल हो कर, दिल पर पत्थर रख कर अवेस मिर्ज़ा साहब और बाबू भाई से माज़रत के साथ मैंने अकोला जाना बंद करदिया और उन दोनों से गुज़ारिश की के, केस को तमाम तरीके की सियासत से दूर रख कर एक हो कर लड़िये। फ़तेह अपनी ही है। बस इंतेज़ार ये है के हमारे बच्चे कब बाहर निकलेंगे। निकलेंगे तो ज़रूर।

*11. ट्रायल और जजमेंट*

अली रज़ा साहब, दिलदार खान साहब और नजीब साहब की कड़ी मेहनत, वाज़ेह और पुख्ता दलिलों  और अनथक कोशिशों के बाद केस की कार्यवाही मुकम्मिल हुई और शोएब और हाफिज मुजीब को रिहा किया गया। अब्दुल मलिक को 3 साल की सज़ा और 20,000/ रुपये जुर्माना सुनाया गया। चूंके अब्दुल मालिक 3साल से ज़्यादा जेल में रह चुका है इसलिए उसे भी रिहा कर दिया गया।

*12. काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब,*
*शर्म तुमको मगर नही आती।*

जिन लोगों ने दस्तखत किए थे कार्यवाही के लिए, जिन लोगों ने मुझसे अर्ज़ी वापस लेने को कहा था , जिन लोगो के नाम चार्जशीट में तीनो अभियुक्तों से ज़्यादा बार आये थे मग़र उन्हें अभियुक्त नही बनाया गया कल वोह लोग अभियुक्तों की रिहाई का क्रेडिट लेते दिखे।

क्रेडिट और सलाम के असली हक़दार है अली रज़ा साहब, नजीब साहब, दिलदार खान साहब, तहिवार पठान साहब, इशरत खान साहब, अतीक साहब, नग़मान अली साहब, जमीयत के ओहदेदाराण, जमाअत के ओहदेदाराण, अभियुक्तों के घर वाले, उनके दोस्त अहबाब और वह हज़ारों लोग जिन्होंने उनके लिए दुआ की और थोड़ा बहोत ये नाचीज़ आकिद मिर्ज़ा जिसे अल्ल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने ये काम करवाया।

*"जिस बात पर कोई मुस्कुरा दे...*

*बात बस वहीं ख़ूबसूरत है...!!"*

दुआओं का तालिब।
अल्लाह हर मुसलमान को हर आफत व मुसीबत से बचाये।

आमीन

व सलाम

*एडवोकेट आकिद मिर्ज़ा, नागपुर (पुसद)*
मोबाइल नं. 8888603609

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