Wednesday, June 17, 2020

एर्तग्रल देखें या न देखें?



एर्तग्रल ड्रामा इस वक़्त आम व खास मे बहस का मौज़ू बना हुआ है । जो ड्रामा देखने के क़ायल नहीं हैं वह इसे मुख्तलिफ वुजूहात के सबब हराम और शौक़ीन हज़रात इसे देखने की तलक़ीन करते नही थक रहे हैं ।
ज़रूरत एतिदाल की राह इख्तियार करने की है ।
अगर हम गौर करेंगे तो महसूस होगा कि पिछ्ली चार दहाइयों से बिलखुसूस दुनिया नज़रियाती और तहज़ीबी जंग मे मुब्तिला है और हर तहज़ीब के मानने वाले अपनी तहज़ीब को बरतर साबित करके आम करने की कोशिश करने मे मसरूफ हैं । मीडिया का इस्तेमाल इसके लिये बहुत बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। यह मीडिया तहज़ीब, रिवायात, खबरें वगेरह आम करने के साथ-साथ कारोबार का भी बहुत बड़ा ज़रिया है ।
इंसानी दिलचस्पी का एक बड़ा साधन अदब (लिटरेचर) है और यह अदब ही इस मीडिया की मक़बूलियत और कामयाबी का खास ज़रिया है । इसी के ज़रिये बड़े पैमाने पर अज़्हान बनाये और बिगाड़े जा रहे हैं ।
यह सब आम तौर से मुआशरे की अक्कासी करता है । हालांकि लिट्रेरी थ्योरी में यह बात भी बड़े वज़न के साथ कही जाती है कि मुआशरे के हालात के पलट थियेटर/सिनेमा वगेरह पसंद किये जाते हैं मसलन समाज खुशहाली के वक़्त ट्रेजिडी और ट्रेजिडी के वक़्त कॉमेडी पसंद करता है । यह भी थ्योरी है कि समाज को दोनो हालात से वाक़िफ़ कराने के लिये अदब का यह इस्तेमाल किया जाता है ।
जैसा कि अर्ज़ किया जा चुका है कि यह दौर तहज़ीबी बरतरी साबित करने का है। इसी मक़सद के तहत हमारे मुल्के अज़ीज़ मे रामायण और महाभारत को नश्र किया गया और फिर से किया जा रहा है । इन ड्रामो के मुख्तलिफ किरदारों को चुनाव मे उतार कर राय आम्मा (पब्लिक ओपिनियन)  को आज़माया गया और इनकी कामयाबी को मद्देनजर रखकर इस काम को आगे बढ़ाया गया । पिछ्ले सालों मे शुरु हुए मुख्तलिफ डैली सोप्स मे मज़हबी रिवायात को फरोग, हर त्योहार और रुसूम को बहुत बारीक़ी और तरतीब के साथ दिखाकर मुक़ामी त्योहारों वगैरह को क़ौमी बनाना बड़ा मक़सद था जिसके ज़रिये मुख्तलिफ तब्क़ात मे बटे हुए समाज को जोड़ने की काफी हद तक कामयाब कोशिश की गई जिसे हम अपने मुआशरे मे काफी हद तक महसूस भी कर रहे हैं ।

*अब बात करते हैं एर्तग्रल ड्रामे की।*
इसमे कोई शक नही कि यह महज़ एक ड्रामा है और इसे तक़्वे के फरोग के लिये नहीं बनाया गया है ।
एक ज़माना किताबो का था और आज का ज़माना डिजिटल और विज़ुअल किताबों का है ।
एर्तग्रल मे यह ज़रूर बात है कि यह मुस्लिम तारीख के एक अहम बाब खिलाफते उस्मानिया के क़याम और उसके ज़रिये किये गये कारनामों को किसी हद तक दिखाता है । ड्रामे गुलू (बातों को बढ़ा चढ़ा कर बताना) से खाली नही होते। लेकिन इसमे बार-बार नमाज़, अद्ल, सिलह रहमी, शक के बावजूद सबूत न होने पर सज़ा न देना, तादाद की क़िल्लत के बावजूद ईमान की ताक़त पर आगे बढ़ना और जुर्रत करना वगेरह जैसे मस्बत पहलुओं को उजागर किया गया । मुस्लिम तारीख जिसे आज हम में से 90% से ज़्यादा लोग भूल चुके हैं उसे फिर से याद दिलाने में यह ड्रामा मुआविन साबित हो रहा है । इससे पहले यह खिदमत नसीम हिजाज़ी वगैरह की नावल्स अदा करती रही हैं जिन्हे पढ़ कर न जाने कितने लोगों के ईमान ताज़ा हुए।

इससे पहले न जाने कितने ड्रामे तारीखी वाक़ेआत पर बन चुके हैं लेकिन आखिर क्या वजह है कि इसी एक एर्तग्रल ड्रामे से बहुत से लोगों की नींदें हराम और ईमान पर हमले महसूस हो रहे हैं?
यह दोनो चीज़ें एक साथ होना कुछ अजीब और साज़िशी तो नही ?

यह भी याद रखने के क़ाबिल है कि तुर्की फह्हाशी और उर्यानियत का गढ़ रहा है । पूरा मगरिबी  कल्चर वहाँ आम करके इस्लाम को खुरच-खुरच कर खत्म करने की कोशिश की गई। वहाँ हिजाब और दीगर इस्लामी शआइर पर पाबंदी यहाँ तक कि एक लम्बे अर्से तक अरबी ज़बान मे अज़ान तक पर भी पाबंदी रही और बड़ी क़ुर्बानियों के बाद अरबी अज़ान से पाबंदी हटाई गई।
वह मुल्क जहाँ शायद इस्लामी शआइर को दिखाना किसी खतरे से खाली नहीं था और बगेर उर्यानियत और फह्हाशी के किसी ड्रामे और फिल्म की कामयाबी के इम्कान ही न समझे जा सकते हों वहाँ इन तमाम बुराइयों से तक़रीबन पाक ड्रामा बनाना बहुत बड़े जिगर की बात है खास कर उसके प्रोड्यूसर के लिये।
इस ड्रामे की पूरी दुनिया मे मक़्बूलियत से यह बात भी साबित होती है कि इस मिल्लत में  ईमान की शमा अभी तक रोशन है चाहे मद्धम ज़रूर पड़ गई हो। यह भी साबित होता है कि अगर मिल्लत को अच्छे ऑप्शन दिये जायें तो बुराई से रुकना आसान हो जाता है ।
इस ड्रामे से इस्लाम के बुनियादी उसूल तौहीद, रिसालत, आखिरत, अद्ल वगैरह ज़ाहिर होते हैं जिसे दुनिया उस वक़्त देख रही है जब इस्लाम को दहशतगर्दी के नाम पर बदनाम करने की एक लम्बे अर्से से नापाक कोशिश जारी है ।
हमारी लाख कोशिशों के बावजूद हम इस झूठे इल्जाम से दामन नहीं छुटा पा रहे हैं । ऐसे मे इस ड्रामे से दुनिया भर मे बहुत मसबत नताइज सामने आ रहे हैं जैसा कि सोशल मीडिया पर रिव्यूज़ देखने और पढ़ने मे आ रहे हैं । न्यूयार्क टाइम्स ने इसे "सॉफ़्ट बम" बताने मे हिचकिचाहट महसूस नहीं की हो।
इसके ज़रिये मुसलमान अपने ताबनाक माजी से अगर वाक़िफ़ हो रहे हैं तो इसलिए इस तरह के ड्रामे ज़्यादा से ज़्यादा बनना चाहिए ताकि आम इंसानों को बुराई के रास्ते पर ले जाने की साज़िश नाकाम हो सके।
हर ज़माने मे अपनी बात पहुँचाने के ज़राय अलग-अलग होते हैं । अदब, ड्रामे, फिल्म, थिएटर वगैरह आज के ज़राय हैं । हम बायकाट करके कामयाबी हासिल नही कर सकते अलबत्ता उन ज़राय का जायज़ इस्तेमाल करके अवाम को मस्बत मुताबादिल पेश करना लाज़िम है ।
आखिर में यह बात ज़रूर अर्ज़ करूंगा कि जो ड्रामे नही देखते वह चाहें तो इसे न देखे और अपने तक़्वे पर हर्फ न आने दें अलबत्ता जो ड्रामे देखते हैं उन्हें ज़रूर एर्तग्रल ड्रामा देखकर यह जानना चाहिये कि ड्रामे कैसे होने चाहिये और आज तक ड्रामे के नाम पर क्या देखते आ रहे है ?
इस ड्रामे की कामयाबी पाक और बामक़सद अदब और ड्रामे बनाने की राह ज़रूर खोलेगी और दुनिया बातिल के नापाक मंसूबों को नाकाम होते हुए ज़रूर देखेगी इन्शाअल्लाह ।
📝 मुहम्मद इमरान

अमिश देवगन के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाएगी जमीयत उलेमा-ए-हिंद


मौलाना अरशद मदनी- ‘अमिश देवगन के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाएगी जमीयत उलेमा-ए-हिंद’
 जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष अरशद मदनी ने कहा कि मोईनुल हिन्द हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी की शान में एक टीवी चैनल के एंकर ने जिस तरह से अपशब्द कहे और उनको अक्रांता और लुटेरा तक कह डाला है उस से भारत ही नहीं पूरी दुनिया में सभी धर्मों के लोग जो ख्वाजा साहब में अपनी आस्था रखते हैं उनके दिल को ठेस पहुंची है। उन्होंने कहा कि हजरत ख्वाजा अजमेरी सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि दुनिया में पाए जाने वाले सभी जात धर्म और समुदायों के एक बड़े हिस्से को प्रिय हैं।

Sunday, June 14, 2020

आत्महत्या और इस्लाम


आत्महत्या करना एक महापाप है।

मार्गदर्शन:

    ★ज्यादा तर आत्महत्या करने वाले लोग किसी चीज से निराश हो कर आत्महत्या करने का कदम उठाते हैं। टेन्शन के कारण आत्महत्या करते हैं। अल्लाह तआला ने कठिन स्थिति और नाजुक हालात में सब्र से काम लेने का आदेश दिया है और अल्लाह की नेमतों से निराश न होने पर उभारा है। इस्लाम में आत्महत्या करना भी बहुत बड़ा पाप है। क्योंकि यह जीवन अल्लाह की ओर से दी गई है, जिसे अल्लाह के आदेश से अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चल कर गुज़ारना है। अल्लाह का फरमान है।

وَلَا تَقْتُلُوا أَنفُسَكُمْ ۚ إِنَّ اللَّـهَ كَانَ بِكُمْ رَ‌حِيمًا -وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ عُدْوَانًا وَظُلْمًا فَسَوْفَ نُصْلِيهِ نَارً‌ا ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّـهِ يَسِيرً‌ا – إِن تَجْتَنِبُوا كَبَائِرَ‌ مَا تُنْهَوْنَ عَنْهُ نُكَفِّرْ‌ عَنكُمْ سَيِّئَاتِكُمْ وَنُدْخِلْكُم مُّدْخَلًا كَرِ‌يمًا. (سورة النساء: 31)

और न ही आत्महत्या करो। निस्संदेह अल्लाह तुम पर बहुत दयावान है – और जो कोई ज़ुल्म और ज़्यादती से ऐसा करेगा, तो उसे हम जल्द ही जहन्नम में झोंक देंगे, और यह अल्लाह के लिए सरल है-यदितुम उन बड़े गुनाहों से बचते रहो, जिन से तुम्हें रोका जा रहा है, तो हमतुम्हारी बुराइयों को तुम से दूर कर देंगे और तुम्हें प्रतिष्टित स्थान मेंप्रवेश कराएँगे। (सूरह अन्निसाः 29,30,31)

जिस व्यक्ति ने आत्महत्या किया, तो वह हमेशा हमेश के लिए जन्नहम में दाखिल होगा। जहन्नम में अपने आप को उसी वस्तु से कष्ट देता रहेगा, जिस वस्तु से दुनिया में आत्महत्या किया था। सिवाए कि अल्लाह उसे क्षमा कर दे।

مَن قتل نفسه بشيء في الدنيا عذب به يوم القيامة. (صحيح البخاري: 5700) و(صحيحمسلم: 110

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कथन हैः जिसने दुनिया में किसी वस्तु से आत्महत्या किया तो उसी से क़ियामत के दिन उसे यातना दिया जाएगा। (सही बुखारीः 5700 व सही मुस्लिमः110)

इस अज़ाब के प्रति कुछ विस्तार से दुसरी हदीस में इस प्रकार विवरण हुआ है। रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ) के इस कथन पर विचार करें।

عن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: مَن تردى من جبل فقتل نفسه فهو في نار جهنم يتردى فيه خالداً مخلداً فيها أبداً، ومَن تحسَّى سمّاً فقتل نفسه فسمُّه في يده يتحساه في نار جهنم خالداً مخلداً فيها أبداً، ومَن قتل نفسه بحديدة فحديدته في يده يجأ بها في بطنه في نار جهنم خالداً مخلداً فيها أبداً.  (صحيح البخاري: 5442) و(صحيح مسلم: 109

अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः जिस ने पहाड़ से गिर कर आत्महत्या किया, तो वह जहन्नम में दाखिल होगा और उस में हमेशा हमेश अपने आप को पहाड़ से गिरा कर सज़ा देता रहेगा और जिसने जहर खा कर आत्महत्या किया तो जहन्नम में दाखिल होगा और जहर उस के हाथ में होगा जिस से वह हमेशा स्वयं सज़ा देता रहेगा। और जिस ने धारदार छुरी से आत्महत्या किया। तो जहन्नम में धारदार छुरी उस के हाथ में होगा और हमेशा हमेश वह अपने आप को उस से सज़ा देता रहेगा।  (सही बुखारीः 5442 व मुस्लिमः 109)

आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अल्लाह पर विश्वास नहीं करता और अल्लाह की दी हुइ जीवन को बिना उसके अनुमति के खत्म करता है तो अल्लाह तआला उस पर जन्नत हराम कर देता जैसा कि रसूल(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)ने पूर्व लोगों में से एक व्यक्ति का किस्सा इस प्रकार बयान फरमाया हैः

وعن جندب بن عبد الله رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: كان فيمن كان قبلكم رجل به جرح فجزع فأخذ سكيناً فحز بها يده فما رقأ الدم حتى مات. قال الله تعالى: بادرني عبدي بنفسه حرمت عليه الجنة.   ( البخاري: 3276 ) و(صحيح مسلم: 113

जुन्दुब बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः तुम से पूर्व समाज में एक व्यक्ति था जब वह ज़ख्मी हो गया जिस से उसे बहुत पीड़ा का अनुभव हुआ और पीड़ा के कारण उसने एक चाकू लिया और अपने हाथ को काट लिया जिस कारण रक्त बहता रहा, यहाँ तक उसकी मृत्यु हो गई। तो अल्लाह ने फरमायाः मेरे इस दास ने अपने आप के साथ जल्दबाज़ी की तो मैंने इस पर जन्नत को वर्जित कर दिया है।  (सही बुखारीः 3276 व सही मुस्लिमः 113)

जो लोग भी आत्महत्या करते हैं। तो वास्तव में ऐसे लोग बुज्दिल हैं। जो समस्याओं के समाधान से डर कर भागते हैं और अपने परिवार वालों के जिवन में दड़ाड़ उत्पन्न करते हैं और अपने सृष्टिकर्ता के आदेश की अवज्ञा करते हैं। अल्लाह तआला पर विश्वास और भरोसा नहीं करते हैं। जिस कारण अल्लाह तआला ऐसे लोगों से सख्त नाराज होता है और उन्हें कठोर यातनाओं में ग्रस्त करेगा। जैसा कि उपर कुछ दलीलें बयान किया गया है।

Monday, June 8, 2020

आईपीएस अब्दुल रहेमान एक बेहद शानदार किताब लिखी है —Denial and Deprivation. जरूर पढ़िए


ये हैं आईपीएस अब्दुर रहमान जी, वही अब्दुर रहमान जिन्होंने ‘नागरिकता संशोधन क़ानून’ के ख़िलाफ़ एक झटके में महाराष्ट्र पुलिस में अपने आईजी के पद से इस्तीफ़ा दे दिया और फिर आम लोगों की तरह सड़कों की खाक छानते हुए पूरे भारत में लोगों को जागरूक करते रहे. लॉकडाउन के दौरान जब मां बिस्तर पर थीं तब इन्हें अपनी क़ौम की फ़िक्र थी. कोई भी उन्हें कॉल करता या सोशल मीडिया पर उन्हें कोई सूचना देता तो तुरंत उसकी समस्या को हल करने में लग जाते.मुझे याद है कि जिस दिन इनकी अम्मी की इंतक़ाल हुआ था, उस दिन जनाज़े के तुरंत बाद भी वो अपने गांव के लोगों से मिलकर उनका दर्द जानने में लगे रहे… अब मुंबई में हैं, लेकिन दिन-रात में अपने हिसाब से लोगों की सेवा में लगे हुए हैं.और हां, भाई ने एक बेहद शानदार किताब लिखी है —Denial and Deprivation. सच पूछे तो ये किताब सच्चर कमिटी रिपोर्ट व रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट के बाद देश में मुसलमानों की हालत का एक जीता-जागता अहम दस्तावेज़ है.जिन लोगों को भी देश में मुसलमानों की हालत समझनी है उन्हें ये किताब हर हाल में ज़रूर पढ़नी चाहिए. लेकिन प्लीज़, मुफ़्त में मांगने की कोशिश न करें. किताब अमेज़न पर उपलब्ध है. बस गुगल पर सर्च करें, अमेज़न का लिंक आपके सामने होगा…