एर्तग्रल ड्रामा इस वक़्त आम व खास मे बहस का मौज़ू बना हुआ है । जो ड्रामा देखने के क़ायल नहीं हैं वह इसे मुख्तलिफ वुजूहात के सबब हराम और शौक़ीन हज़रात इसे देखने की तलक़ीन करते नही थक रहे हैं ।
ज़रूरत एतिदाल की राह इख्तियार करने की है ।
अगर हम गौर करेंगे तो महसूस होगा कि पिछ्ली चार दहाइयों से बिलखुसूस दुनिया नज़रियाती और तहज़ीबी जंग मे मुब्तिला है और हर तहज़ीब के मानने वाले अपनी तहज़ीब को बरतर साबित करके आम करने की कोशिश करने मे मसरूफ हैं । मीडिया का इस्तेमाल इसके लिये बहुत बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। यह मीडिया तहज़ीब, रिवायात, खबरें वगेरह आम करने के साथ-साथ कारोबार का भी बहुत बड़ा ज़रिया है ।
इंसानी दिलचस्पी का एक बड़ा साधन अदब (लिटरेचर) है और यह अदब ही इस मीडिया की मक़बूलियत और कामयाबी का खास ज़रिया है । इसी के ज़रिये बड़े पैमाने पर अज़्हान बनाये और बिगाड़े जा रहे हैं ।
यह सब आम तौर से मुआशरे की अक्कासी करता है । हालांकि लिट्रेरी थ्योरी में यह बात भी बड़े वज़न के साथ कही जाती है कि मुआशरे के हालात के पलट थियेटर/सिनेमा वगेरह पसंद किये जाते हैं मसलन समाज खुशहाली के वक़्त ट्रेजिडी और ट्रेजिडी के वक़्त कॉमेडी पसंद करता है । यह भी थ्योरी है कि समाज को दोनो हालात से वाक़िफ़ कराने के लिये अदब का यह इस्तेमाल किया जाता है ।
जैसा कि अर्ज़ किया जा चुका है कि यह दौर तहज़ीबी बरतरी साबित करने का है। इसी मक़सद के तहत हमारे मुल्के अज़ीज़ मे रामायण और महाभारत को नश्र किया गया और फिर से किया जा रहा है । इन ड्रामो के मुख्तलिफ किरदारों को चुनाव मे उतार कर राय आम्मा (पब्लिक ओपिनियन) को आज़माया गया और इनकी कामयाबी को मद्देनजर रखकर इस काम को आगे बढ़ाया गया । पिछ्ले सालों मे शुरु हुए मुख्तलिफ डैली सोप्स मे मज़हबी रिवायात को फरोग, हर त्योहार और रुसूम को बहुत बारीक़ी और तरतीब के साथ दिखाकर मुक़ामी त्योहारों वगैरह को क़ौमी बनाना बड़ा मक़सद था जिसके ज़रिये मुख्तलिफ तब्क़ात मे बटे हुए समाज को जोड़ने की काफी हद तक कामयाब कोशिश की गई जिसे हम अपने मुआशरे मे काफी हद तक महसूस भी कर रहे हैं ।
*अब बात करते हैं एर्तग्रल ड्रामे की।*
इसमे कोई शक नही कि यह महज़ एक ड्रामा है और इसे तक़्वे के फरोग के लिये नहीं बनाया गया है ।
एक ज़माना किताबो का था और आज का ज़माना डिजिटल और विज़ुअल किताबों का है ।
एर्तग्रल मे यह ज़रूर बात है कि यह मुस्लिम तारीख के एक अहम बाब खिलाफते उस्मानिया के क़याम और उसके ज़रिये किये गये कारनामों को किसी हद तक दिखाता है । ड्रामे गुलू (बातों को बढ़ा चढ़ा कर बताना) से खाली नही होते। लेकिन इसमे बार-बार नमाज़, अद्ल, सिलह रहमी, शक के बावजूद सबूत न होने पर सज़ा न देना, तादाद की क़िल्लत के बावजूद ईमान की ताक़त पर आगे बढ़ना और जुर्रत करना वगेरह जैसे मस्बत पहलुओं को उजागर किया गया । मुस्लिम तारीख जिसे आज हम में से 90% से ज़्यादा लोग भूल चुके हैं उसे फिर से याद दिलाने में यह ड्रामा मुआविन साबित हो रहा है । इससे पहले यह खिदमत नसीम हिजाज़ी वगैरह की नावल्स अदा करती रही हैं जिन्हे पढ़ कर न जाने कितने लोगों के ईमान ताज़ा हुए।
इससे पहले न जाने कितने ड्रामे तारीखी वाक़ेआत पर बन चुके हैं लेकिन आखिर क्या वजह है कि इसी एक एर्तग्रल ड्रामे से बहुत से लोगों की नींदें हराम और ईमान पर हमले महसूस हो रहे हैं?
यह दोनो चीज़ें एक साथ होना कुछ अजीब और साज़िशी तो नही ?
यह भी याद रखने के क़ाबिल है कि तुर्की फह्हाशी और उर्यानियत का गढ़ रहा है । पूरा मगरिबी कल्चर वहाँ आम करके इस्लाम को खुरच-खुरच कर खत्म करने की कोशिश की गई। वहाँ हिजाब और दीगर इस्लामी शआइर पर पाबंदी यहाँ तक कि एक लम्बे अर्से तक अरबी ज़बान मे अज़ान तक पर भी पाबंदी रही और बड़ी क़ुर्बानियों के बाद अरबी अज़ान से पाबंदी हटाई गई।
वह मुल्क जहाँ शायद इस्लामी शआइर को दिखाना किसी खतरे से खाली नहीं था और बगेर उर्यानियत और फह्हाशी के किसी ड्रामे और फिल्म की कामयाबी के इम्कान ही न समझे जा सकते हों वहाँ इन तमाम बुराइयों से तक़रीबन पाक ड्रामा बनाना बहुत बड़े जिगर की बात है खास कर उसके प्रोड्यूसर के लिये।
इस ड्रामे की पूरी दुनिया मे मक़्बूलियत से यह बात भी साबित होती है कि इस मिल्लत में ईमान की शमा अभी तक रोशन है चाहे मद्धम ज़रूर पड़ गई हो। यह भी साबित होता है कि अगर मिल्लत को अच्छे ऑप्शन दिये जायें तो बुराई से रुकना आसान हो जाता है ।
इस ड्रामे से इस्लाम के बुनियादी उसूल तौहीद, रिसालत, आखिरत, अद्ल वगैरह ज़ाहिर होते हैं जिसे दुनिया उस वक़्त देख रही है जब इस्लाम को दहशतगर्दी के नाम पर बदनाम करने की एक लम्बे अर्से से नापाक कोशिश जारी है ।
हमारी लाख कोशिशों के बावजूद हम इस झूठे इल्जाम से दामन नहीं छुटा पा रहे हैं । ऐसे मे इस ड्रामे से दुनिया भर मे बहुत मसबत नताइज सामने आ रहे हैं जैसा कि सोशल मीडिया पर रिव्यूज़ देखने और पढ़ने मे आ रहे हैं । न्यूयार्क टाइम्स ने इसे "सॉफ़्ट बम" बताने मे हिचकिचाहट महसूस नहीं की हो।
इसके ज़रिये मुसलमान अपने ताबनाक माजी से अगर वाक़िफ़ हो रहे हैं तो इसलिए इस तरह के ड्रामे ज़्यादा से ज़्यादा बनना चाहिए ताकि आम इंसानों को बुराई के रास्ते पर ले जाने की साज़िश नाकाम हो सके।
हर ज़माने मे अपनी बात पहुँचाने के ज़राय अलग-अलग होते हैं । अदब, ड्रामे, फिल्म, थिएटर वगैरह आज के ज़राय हैं । हम बायकाट करके कामयाबी हासिल नही कर सकते अलबत्ता उन ज़राय का जायज़ इस्तेमाल करके अवाम को मस्बत मुताबादिल पेश करना लाज़िम है ।
आखिर में यह बात ज़रूर अर्ज़ करूंगा कि जो ड्रामे नही देखते वह चाहें तो इसे न देखे और अपने तक़्वे पर हर्फ न आने दें अलबत्ता जो ड्रामे देखते हैं उन्हें ज़रूर एर्तग्रल ड्रामा देखकर यह जानना चाहिये कि ड्रामे कैसे होने चाहिये और आज तक ड्रामे के नाम पर क्या देखते आ रहे है ?
इस ड्रामे की कामयाबी पाक और बामक़सद अदब और ड्रामे बनाने की राह ज़रूर खोलेगी और दुनिया बातिल के नापाक मंसूबों को नाकाम होते हुए ज़रूर देखेगी इन्शाअल्लाह ।
📝 मुहम्मद इमरान

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